वीरता पर संस्कृत श्लोक अर्थ सहित

इस अंक में वीरता पर संस्कृत श्लोक प्रस्तुत हैं। भारत देश में अनेकों वीर एवं वीरांगनाओं ने जन्म लिया। जिन्होंने अपने पराक्रम और शौर्य से भारत भूमि को कृतार्थ किया। ऐसा ही एक नाम रानी लक्ष्मीबाई का इतिहास के पन्नों में है। जिन्होंने वीरता और वीरांगना की परिभाषा बन अनेकों महिलाओं को देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने को प्रेरित किया।

वीरता पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित
Veerata par sanskrit shlok

भारत देश का इतिहास पराजय का नहीं पराक्रम का है। हमारा देश महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, छत्रसाल , वप्पा रावल जैसे अनेक वीरों की जन्मभूमि है।

वीरता पर संस्कृत श्लोक

“उत्तिष्ठत सं नह्यध्वमुदाराः केतुभिः सह ।”

अर्थ – हे योद्धाओं..! उठो और कमर कसकर हाथ में धर्म ध्वज लेकर आगे आओ।

“वीर भोग्या वसुंधरा।”

भावार्थ- वीर ही पृथ्वी एवं उसके संसाधनों का उपभोग करते हैं।

“क्षमा वीरस्य भूषणं।”

अर्थात – क्षमा वीरों का आभूषण होता है।

“तत्त्वज्ञस्य तृणं शास्त्रं वीरस्य
समरस्तृणम्।
विरक्तस्य तृणं नारी निस्स्पृहस्य नृपास्तृणम् ।।”


अर्थ – योद्धा के लिए युद्ध बहुत छोटी बात है। तत्व को जानने वाले के लिए शास्त्र छोटी बात है। निर्लोभी के लिए राजा बहुत छोटा है। वैरागी के लिए स्त्री बहुत छोटी बात है।

“अङ्णवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम् ।
वल्मीकश्च सुमेरूः कृतप्रतिज्ञस्य वीरस्य ।”

अर्थात – दृढ़ संकल्पित योद्धा के लिए सम्पूर्ण वसुधा कुटुंब रूपी आंगन के समान है। सागर नदी के समान है। सुमेरू जैसा पर्वत भी चीटियों का धाम ही है।

“अष्टौ गुणा पुरुषं दीपयंति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च।
पराक्रमश्चबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥”

अर्थ – उत्तम चरित्र, शास्त्र ज्ञान, कृतज्ञता, बुद्धि, क्षमता, वीरता, कम बोलना एवं आत्मसंयम आदि अष्टगुण मनुष्य की शोभा बढ़ाते हैं।

“वीरः पराभवे न भयंति पराजये च निद्रया।
युद्धे वीरोऽपि सर्वेऽपि वीरत्वं प्राप्नुयात्क्षणात्॥”

अर्थात – वीर हार जाने पर सोता नहीं। पराभव से भय नहीं। रण में प्रतिक्षण वीरत्व की प्राप्ति करता है।

“बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः। उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता।।”


अर्थात – जय-पराजय का भय नहीं। वंधन हो चाहे मृत्यु हर परिस्थिति में समभाव रखता है। वही सच्चा वीर होता है। यही वीरता कहलाती है।

शौर्य पर संस्कृत श्लोक

“शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥”

अर्थ – दान करना, युद्ध भूमि से न भागना, धैर्य रखना, वीर होना, दक्ष होना, तेज एवं राजा होने का स्वभाव। यही सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।

“न धैर्येण विना लक्ष्मी-र्न शौर्येण विना जयः। न ज्ञानेन विना मोक्षो -न दानेन विना यशः॥”

अर्थ- जैसे वीरता के बिना विजय प्राप्त नहीं होती। ठीक वैसे ही धैर्य के बिना धन की प्राप्ति नहीं होती। और मोक्ष भी बिना ज्ञान के प्राप्त नहीं होता। दान बिना यश की प्राप्ति नहीं होती।

“युद्धे शौर्यं प्रयासेन शीलं युद्धं विक्रमेण च।
वीरता युद्धे प्राप्तस्य तत्र सर्वं प्रकाशते॥”

अर्थात – जो शौर्य, वीरता, प्रयास से रण करते हैं। उनके गुण प्रदीप्त होते हैं।

“हृदयस्य निर्मलत्वं, त्यागवृत्तिः, वीरत्वं, सुखे च दुःखे च समानभावः, पटुता, अनुरागः, सत्यता- इमे मित्रस्य गुणाः सन्ति ।”

अर्थ – सत्य एवं अनुराग, निर्मल ह्रदय, चतुराई, त्यागभाव, सुख-दुख में समभाव और शूरता। यह मित्र के गुण हैं।

“सूरा के मैदान में, कायर का क्या काम।
सूरा सो सूरा मिलै तब पूरा संग्राम।।”

अर्थ – रणभूमि में कायर का कोई कार्य नहीं। जब वीर से वीर मिलता है तभी युद्ध पूर्ण होता है। एक तपस्वी को ज्ञानी गुरु मिलता है तभी पूर्ण विजय की प्राप्ति होती है।

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Conclusion –

युद्धभूमि वीरों से ही शोभायमान होती है। ऐसा ज्ञानी पुरुष कहते हैं! इस अंक में शौर्य एवं वीरता पर संस्कृत श्लोक संग्रहित थे! यह एक छोटा सा संग्रह एवं छोटा सा प्रयास था। वैसे तो हमारी मातृभूमि भारतमाता अनेक वीरों की जननी है! हमारी मातृभूमि कितने वीरों की शौर्यगाथायें संकलित किये है।

प्रिय पाठक..! आप हमारे लिए। अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ठीक वैसे ही आपके सुझाव भी हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं! इस छोटे से प्रयास पर आप अपने सुझाव व्यक्त कर सकते हैं! आप अपने सुझाव ‘कमेंट’ के माध्यम से अवश्य प्रस्तुत करें ऐसा मेरा निवेदन है..!

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