रामचरितमानस का पहला दोहा सही उत्तर

इस अंक में श्री रामचरितमानस का पहला दोहा प्रस्तुत है। मानस हमारी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यदि आप सनातन संस्कृति को मानते हैं। तो आपने कभी न कभी मानस अवश्य पढ़ी होगी। मानस से जुड़े ऐसे अनेकों तथ्य हैं, जो हमें पता नहीं होते हैं। इस लेख में ऐसे ही एक तथ्य के बारे में समझने का प्रयास करेंगे। यदि आपको भी मानस से जुड़ा कोई तथ्य पता है। तो हमें अवश्य बताएं।

रामचरितमानस का पहला दोहा
रामचरितमानस का पहला दोहा

क्या आपको पता है, ऐसे कौन दो लोग थे जिन्होंने सम्पूर्ण रामचरितमानस में राम जी से कुछ नहीं मांगा? पहले केवट भैया और दूसरे भरत भैया जिन्होंने प्रभु राम जी से कुछ नहीं। महापुरुषों ने भगवत्प्राप्ति के चार साधन बताए हैं। नाम, रूप, लीला और धाम। पहला विकल्प है कि भगवान के नाम का आश्रय ले लिया जाए। या फिर भगवान के रूप दर्शन का स्वभाव बन जाये। तीसरा भगवान की लीलाओं या कथाओं के श्रवण का सौभाग्य प्राप्त हो। चौथा भगवान के धामों में निवास स्थान हो जाये।

रामचरितमानस का पहला दोहा

“जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥”

– गोस्वामी तुलसीदास
अर्थात - जैसे सिद्धजनों को नेत्रों में लगातार साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वी के अंदर कौतुक से बहुत से खानें देखते हैं।

उपरोक्त दोहा ही श्री रामचरितमानस का पहला दोहा है। मानस प्रथम सोपान बालकांड से शुरू होती है। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने सर्वप्रथम सात श्लोकों, पांच सोरठों एवं चार चौपाइयों का उल्लेख किया। तत्पश्चात रामचरितमानस के प्रथम दोहा की रचना की। क्या आपको पता है कि श्री रामचरितमानस की प्रथम चौपाई कौन सी है?

Conclusion

मानस की महिमा अनंत है। गोस्वामी जी ने मानस में यहां तक कहा है। कि रचना मेरी नहीं बल्कि श्री शंकर भगवान की है। सम्भवतः आपको आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा। आप प्रभु का स्मरण करते रहें। उनके नाम का यशो गान करते रहें। एवं राघवेंद्र सरकार की असीम अनुकम्पा आप पर और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे।

प्रिय पाठक..! आप हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं। यह एक छोटा सा प्रयास है। आपको मानस से जुड़े तथ्य को बताने का। इस बिषय पर आपके सुझाव आमंत्रित हैं। यदि आपको मानस का कोई अन्य तथ्य जानना है। तो आप ‘कमेंट’ के माध्यम अपना तथ्य अवश्य बताएं। हम कोशिश करेंगे आपके तथ्य का सही उत्तर देने का।

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