ईश्वर प्रेम पर दोहे, शायरी

आदियोगी के इस अंक में ईश्वर प्रेम पर दोहे, शायरी संकलित हैं। जैसे माँ अपने बच्चे को कभी दु:ख नहीं देती, परेशान नही करती, वैसे ही जो ईश्वर है। परमात्मा आपको परेशान नहीं करना चाहता।

ईश्वर प्रेम पर दोहे, शायरी
ईश्वर प्रेम पर दोहे, शायरी

यदि तुम परेशान हो तो अपनी खोखली कल्पनाओं के कारण। इसमें ईश्वर का कोई दोष नहीं है। वो परमपिता है किसी जीवधारी के साथ कोई भेदभाव नहीं करता। हमें अपनी कल्पनात्मक दुनिया से निकल कर सच्चाई में जीना होगा।

ईश्वर प्रेम पर दोहे

“प्रेम सहित गहि ध्यान महँ, हृदय बीच जगदीश! अर्पित शालिग्राम-कहँ, करि तुलसी नित शीश!!”

– दोहा संग्रह

“क्षण भंगुर तनु जानिकरि अहंकार-परिहार! सार रूप ईश्वर लखै, तजि असार-संसार!!”

– दोहा संग्रह


“आदि नाम पारस अहै, मन है मैला लोह!
परसत ही कंचन भया, छूटा बंधनमोह!!”

– ईश्वर प्रेम पर दोहे

अर्थात:-
श्री भगवान का स्मरण पारस के जैसा है।
विकृत मन लोहे के जैसा है।
जैसे पारस के संपर्क में आने पर लोहा सोना बन जाता है। ठीक वैसे ही उन श्री हरि के संपर्क में आने पर हमारा मन बिल्कुल शुद्ध हो जाता है।


“जहाँ दया-तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ वहाँ पाप!
जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ-क्षमा वहां आप(श्रीहरि)!!”

ईश्वर प्रेम पर


“ईश्वर इतनी इल्तिजा , करना सहज कबूल।
रोग मुक्त धरती रहे , जन – जीवन अनुकूल ।।”

ईश्वर प्रेम पर


“हे! हरि अनंत आप हो, जग तुझमें समाहित!!
तुझे ध्याऊं हर-दम मैं, मन में हो यह वाहित!!”

ईश्वर प्रेम पर दोहा


“हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥”

– दोहा संग्रह


“पवन तनय संकट हरन,मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित,हृदय बसहु सुर भूप।।”

– दोहा संग्रह


“आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान!
परुष बचन सुनि-काढ़ि असि बोला अति खिसिआन!!”

– ईश्वरीय दोहे


“सो न होई विनु बिमल मति मोहिमति बल अति थोर!
करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि-पुनि करउँ निहोर॥”

– ईश्वरीय दोहे


“जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि!
तास दूत मम जा करि-हरि आनेहु प्रिय नारी!!”

– ईश्वरीय दोहे


“रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई॥”

– दोहा संग्रह


“रहिमन बहु भेषज करत व्याधि न छाड़त साथ!
खग मृग वसत अरोग बन हरि अनाथ के नाथ!!”

– रहीम के दोहे


“मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पाबहिं विनहिं प्रयास! जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास!!”

– हरि दोहा

“हरि माया कृत दोष-गुण विनु हरि भजन न जाहि!
भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहि!!”

– हरि प्रेम दोहा

ईश्वरीय प्रेम पर शायरी

लेख के इस भाग में कुछ शायरी संकलित हैं। ईश्वर से प्रेम के जैसे अनेक माध्यम होते हैं। ठीक वैसे ही ये कुछ सुविचार भी आपको ईश्वर से जोड़ने का एक छोटा सा प्रयास मात्र हैं।

“प्रभु प्रेम और आस्था पर किसी का जोर नहीं..!
ये मन जहां लग जाए वही प्रभु नजर आते हैं।”

– ईश्वरीय सुविचार


“जीवन में प्रेम सिर्फ अपने काम और
ईश्वर से करें..!क्योंकि यह दोनों ही
कभी भी आपको धोखा नहीं देते।”

– ईश्वरीय सुविचार


“प्रेम से उसका हृदय भरा,
जिसके ईश्वर महादेव हैं।”

– ईश्वरीय शायरी


“ईश्वर के प्रेम में रोने का
जो आनंद है वो संसार में हंसने
में भी नहीं है..।”

– ईश्वरीय भक्ति शायरी


“ईश्वर प्रेम और दया से पूर्ण हैं! दर्शन दुर्लभ नही भक्ति दुर्लभ है इस युग़ में..!”

– ईश्वरीय सुविचार


“ईश्वर और प्रेम दोनों ही,
अपरिभाषित शब्द है!”

– ईश्वरीय सुविचार


“प्रेम को एक धुंधला अक्स काफ़ी है!
अपने ईश्वर की मूरत गढ़ने के लिए..!!”

– ईश्वरीय विचार


“बहुत ढूंढा उन्हें पूजा, श्लोक और स्तुति में..!
अंत में, ईश्वर मिला
प्रेम, स्नेह, सेवा और सहानुभूति में..!!”

– ईश्वर पर सुविचार


“ईश्वर प्रकृति के समीप की धुन पर
प्रेम के गीत रचता है..!
जिसे आत्मा सांसों के सुर में ध्यान
के माध्यम से गाती है…!!”

– ईश्वरीय सुविचार

“चिदानंद सुखधाम सिव विगत मोह मद-काम!
विचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम!!”

– विचार संग्रह


“अस कहि नारद सुमिरि प्रभु गिरिजहि दीन्हि असीस!
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीश!!”

– आध्यात्मिक सुविचार

अर्थ सहित ईश्वरीय प्रेम पर दोहे

“सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुण-गान! सादर सुनहि ते तरहिं भब-सिंधु बिना जल-जान ॥”

– दोहा संग्रह


अर्थ – समस्त प्रकार के मंगल प्रदान करने वाले प्रभु मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के गुणों का जो गान करते हैं। और प्रेम पूर्वक सुनते हैं। वे मनुष्य संसार रूपी सागर से सहज ही पर हो जाते हैं।


“साँच बराबर तप नही, झूठ बराबर पाप।
जाके हृदय में साच है ताके हृदय हरि आप।।”

– दोहा संग्रह

अर्थात– इस भौतिक जगत में सत्य के समान कोई तपस्या नहीं। असत्य के समान कोई पाप नहीं। जिसका ह्रदय पवित्र और निर्मल है! उसके ह्रदय में प्रभु स्वयं निवास करते हैं।


“श्री-गुरु चरन सरोज रज, निज मनु-मुकुरु सुधारि!
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल-चारि!!”

– दोहा संग्रह
अर्थात- श्री गुरु महाराज के चरण कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके, श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ। जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को देने वाला है।


“नातो नाते राम कें, राम सनेहँ सनेहु।
तुलसी मांगत जोरि कर, जनम जनम सिव देहु॥”

-दोहा संग्रह
अर्थ- गोस्वामी तुलसीदास हाथ जोड़कर वर की याचना करते हैं।कि हे शिव जी ! मुझे जन्म जन्मान्तरों में यही दीजिए! कि मेरा श्री राम के नाते ही किसी से नाता हो! और श्री राम से प्रेम के कारण ही प्रेम हो।


“वातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस! राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज-ईस!!”

– दोहा संग्रह


अर्थ- मूर्ख तुझे अपने मन को मना लेना चाहिए! तू मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का विरोध करके अपने कुल का नाश कर लेगा। श्री राम से विरोध कर लेने पर तुझे ब्रह्मा-विष्णु-महेश अर्थात त्रिदेव भी शरण नहीं देंगे।

मेरा विचार कि कविराज ने उपरोक्त दोहा रावण के बिषय में कहा होगा। आपका क्या विचार है? कमेंट में जरूर बताएं।


“सहज सूर-कपि भालु सब पुनि-सिर पर प्रभु-राम। रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहि संग्राम।।”

– दोहा संग्रह


अर्थ- समस्त वानर भालू तो अनौपचारिक शूरवीर हैं। उनके ऊपर प्रभु श्री राम जी की कृपा है। वानर भालू ऐसे करोडों रावणों से युद्ध कर आसानी से जीत सकते हैं।

निष्कर्ष –

इस अंक में आपने ईश्वर प्रेम पर दोहे पढ़े। ये एक छोटा सा प्रयास था ! आपको ईश्वर से जोड़ने का। ईश्वर को आप क्या ही दे सकते हैं? हम तो ईश्वर से प्रतिदिन कुछ न कुछ मांगते ही रहते हैं। ईश्वर सिर्फ आपके समर्पण की स्थिति देखते हैं।

आप अपने समर्पण की उच्चतम सीमा तक पहुचते जाएंगे! वैसे-वैसे ईश्वर के पास होते जाएंगे। कभी प्रभु के करीब जाकर तो देखो! ईश्वर के निकट होने का एहसास सर्वोत्तम एहसास है।

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